ब्लैक लहंगा पहन देसी गर्ल बनी Janhvi Kapoor, लगीं बला की खूबसूरत, देखें तस्वीरें
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7/23/2026 08:00:00 PM
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7/23/2026 08:00:00 PM
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In badminton, Indian shuttler PV Sindhu’s campaign at the China Open Super 1000 came to an end after she suffered a defeat against China’s Chen Yufei in the women’s singles round of 16 in Changzhou, China.
PV Sindu bowed out of the tournament at the pre-quarterfinal stage in a match that lasted 89 minutes.
The final score was 21-16, 20-22, 18-21. Sindhu won the first game 21-16. She then held four match points in the second game but could not finish the contest.
Chen won six straight points to take the second game 22-20 and forced a decider. She then won the third game 21-18.
Last week, Sindhu had beaten Chen during her Japan Open Super 750 title run after Chen retired from their match with a hamstring injury.
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7/23/2026 06:23:00 PM
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India is increasingly being viewed as a favourable investment destination by European companies, supported by its strong economic growth, expanding market opportunities, and improving business environment. According to an article in the Euractiv, an independent pan-European media network highlighted that India offers what Europe increasingly needs-a fast-growing consumer market, rising household demand, and significant scope to expand manufacturing capacity. The report noted that, unlike China, where industrial overcapacity and intense competition have reduced profitability, I
ndia provides long-term growth opportunities. The report highlights India’s large consumer base, skilled workforce, expanding digital economy, improving infrastructure, and business-friendly reforms as key factors driving investment. It adds that European companies are showing growing interest in sectors such as manufacturing, technology, renewable energy, healthcare, automobiles, and financial services. Industry experts say stronger India-Europe economic ties could further boost trade, investment, and technology partnerships.
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7/23/2026 06:20:00 PM
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Russian Foreign Minister Sergei Lavrov held a meeting with US Secretary of State Marco Rubio on the sidelines of the ASEAN ministerial meetings in Manila today. During the talks, Mr Lavrov expressed Moscow’s readiness to resolve the conflict in Ukraine and its commitment to the agreement reached in Anchorage. Russian Foreign Minister briefed his US counterpart about the current situation along the combat line and emphasised the importance of not supplying more arms to Ukraine.
The two leaders discussed the normalisation of operating conditions for diplomatic missions of Russia and the US. The two ministers also spoke about regional and international issues, including the situation in West Asia. Last month, Russian Foreign Minister called for clarity on the role the US intends to play in resolving the conflict in Ukraine following Rubio’s comments on the outcomes of the Anchorage summit.
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7/23/2026 06:18:00 PM
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Union Minister of Youth Affairs and Sports Dr Mansukh Mandaviya held a meeting with the Secretary-General Elect of the Commonwealth, Shirley Ayorkor Botchwey, on the sidelines of the Commonwealth Sports Ministers’ Meeting in Glasgow.
During the meeting, Dr Mandaviya highlighted India’s transformative sports reforms, including the Khelo Bharat Niti and ASMITA Leagues.
In a social media post, he said both these initiatives are strengthening grassroots sports, advancing gender inclusion, and creating pathways for sporting excellence across the country.
They also exchanged views on leveraging the Commonwealth Advantage to deepen sports partnerships and unlock new opportunities in trade and investment as India prepares to host the 2030 Commonwealth Games.
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7/23/2026 06:13:00 PM
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The government has refuted social media posts claiming that a 21 year old woman died during the NEET paper leak protest in Delhi. The Fact Check Unit of the Press Information Bureau has clarified that these claims are fake. It said that the woman who was seriously injured in an incident related to the protests is alive and undergoing treatment. The Fact Check Unit informed that her condition is steadily improving, adding that she has been taken off the ventilator. Government has urged people to remain vigilant, avoid falling for misinformation and refrain from sharing unverified claims on social media.
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7/23/2026 06:11:00 PM
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अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए नए परमाणु सहयोग समझौते को लेकर कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच नई बहस छेड़ दी है। उनका कहना है कि यूरेनियम संवर्धन की क्षमता मिलने से भविष्य में परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा बढ़ सकता है। दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ एक अहम परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत सऊदी अरब को भविष्य में अपने यहां यूरेनियम के संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने का रास्ता मिलेगा, जबकि उसके परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों की प्रमुख भूमिका होगी।
समझौते से जुड़े सूत्रों के अनुसार, इसमें ऐसे सुरक्षा प्रावधान भी शामिल किए गए हैं जिनका उद्देश्य सऊदी अरब को हथियार बनाने के लिए यूरेनियम संवर्धन से रोकना है। इसके तहत यदि सऊदी अरब में संवर्धन की अनुमति दी जाती है, तो यह प्रक्रिया अमेरिकी कंपनियों के नियंत्रण में होगी और इस्तेमाल होने वाली तकनीक सऊदी अरब को हस्तांतरित नहीं की जाएगी।
हालांकि समझौते में एक विशेष छूट भी दी गई है। इसके तहत सऊदी अरब को उन कड़े अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों से छूट मिलेगी, जो सामान्यतः ऐसे परमाणु समझौतों में लागू होते हैं। इसकी जगह अमेरिकी विशेषज्ञ निरीक्षण करेंगे। यही प्रावधान कांग्रेस और परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता का कारण बना हुआ है।
वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि यह समझौता अमेरिका और सऊदी अरब के बीच आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करेगा। उन्होंने दावा किया कि समझौता परमाणु सुरक्षा और अप्रसार के उच्चतम मानकों का पालन करता है और इसमें अमेरिकी तकनीक और विशेषज्ञता का उपयोग किया जाएगा। यह समझौता अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत किया गया है। अब इसे कांग्रेस के पास भेजा जाएगा, जहां सांसदों के पास इसकी समीक्षा के लिए 90 दिन का समय होगा। हालांकि यदि कांग्रेस इसे अस्वीकार भी करती है तो राष्ट्रपति वीटो का इस्तेमाल कर इसे लागू करा सकते हैं।
समझौते के अनुसार, दोनों देश अगले दो वर्षों तक यह अध्ययन करेंगे कि सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन आर्थिक और तकनीकी रूप से कितना आवश्यक और व्यावहारिक है। वर्तमान में दुनिया में परमाणु ईंधन की आपूर्ति उपलब्ध है, लेकिन परमाणु ऊर्जा के बढ़ते वैश्विक विस्तार को देखते हुए भविष्य में इसकी मांग बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह का समझौता खतरनाक मिसाल बन सकता है और अन्य देश भी इसी तरह की मांग कर सकते हैं। उनका तर्क है कि इससे परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इस समझौते को लेकर इजरायल में भी चिंता बढ़ गई है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे इजरायल की सुरक्षा के लिए गंभीर रणनीतिक विफलता बताया। उन्होंने कहा कि इससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। इजरायली रक्षा विशेषज्ञों ने भी इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चिंताजनक बताया है।
सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले ही सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यदि ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है तो सऊदी अरब भी उसी दिशा में कदम उठाएगा। यही कारण है कि इस समझौते को लेकर अमेरिका, इजरायल और वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच गंभीर बहस छिड़ गई है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो. बाइडेन और बराक ओबामा के मध्य-पूर्व सलाहकार रह चुके रिचर्ड नेफ्यू ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षकों की भूमिका सीमित करना भविष्य के लिए खतरनाक मिसाल साबित हो सकता है।
नेफ्यू ने कहा कि अमेरिकी निरीक्षक तकनीकी रूप से सक्षम हैं, लेकिन केवल अमेरिकी निगरानी पर अन्य देशों का भरोसा बनना मुश्किल है। उनके मुताबिक, यदि ईरान जैसे देश यह कहें कि उनके परमाणु कार्यक्रम की जांच केवल रूस करेगा, तो अमेरिका इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। इसी तरह, यदि रूस कहे कि क्यूबा के परमाणु प्रतिष्ठानों की जांच वह स्वयं कर रहा है तो अमेरिका उस पर भी भरोसा नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक माहौल में केवल एक देश के निरीक्षण पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं है।
इस समझौते का सबसे बड़ा लाभ अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनी वेस्टिंग हाउस को मिलने की संभावना है। हालांकि समझौते में कंपनी का नाम नहीं है, लेकिन इसमें यह प्रावधान है कि सऊदी अरब के परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे वेस्टिंग हाउस के एपी 1000 रिएक्टरों के इस्तेमाल की संभावना काफी बढ़ गई है। ये रिएक्टर लाखों घरों को बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम हैं।
समझौते में यूरेनियम खनन, रिएक्टर निर्माण के उपकरण और अन्य आपूर्ति शृंखला से जुड़ी अमेरिकी कंपनियों को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई है। हालांकि यदि जरूरत पड़ती है तो सऊदी अरब अन्य देशों से सामग्री, पुर्जे और विशेषज्ञता भी हासिल कर सकेगा। अमेरिकी कांग्रेस में भी समझौते का विरोध शुरू हो गया है। कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट सांसद ब्रैड शेरमन ने प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति की बैठक में कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी कभी अमेरिकी तकनीक से शुरू हुआ था। उन्होंने सवाल उठाया कि यह नहीं कहा जा सकता कि अगले 10 वर्षों में सऊदी अरब की सत्ता किसके हाथ में होगी।
शेरमन ने कहा, “आज अमेरिका ईरान के यूरेनियम संवर्धन और पुनर्प्रसंस्करण कार्यक्रम का विरोध कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर सऊदी अरब को उसी दिशा में आगे बढ़ने की अनुमति दे रहा है। दोनों मामलों में फर्क सिर्फ इतना दिखता है कि इस बार अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ मिलेगा।”
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि मौजूदा विदेश मंत्री मार्को रुबियो सीनेटर रहते हुए “नो न्यूक्लियर वेपन्स फॉर सऊदी अरेबिया एक्ट” के सह-प्रायोजक थे। इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सऊदी अरब के साथ किसी भी परमाणु समझौते को लागू करने से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। वहीं, फिलीपींस दौरे पर पत्रकारों से बातचीत में विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने समझौते पर विस्तार से टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि अमेरिका ऐसा कोई भी समझौता नहीं करेगा, जिससे परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा पैदा हो।(इनपुट-आईएएनएस)
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7/23/2026 12:15:00 PM
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कभी जटिल कागजी प्रक्रियाओं, कई विभागों की मंजूरियों और लंबी प्रशासनिक देरी के लिए पहचाने जाने वाले भारत का कारोबारी माहौल पिछले एक दशक में तेजी से बदला है। डिजिटल गवर्नेंस और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) के विस्तार ने देश में कारोबार करने की प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और तेज बनाया है। सरकार का कहना है कि डिजिटल सुधार अब केवल कागजी कार्रवाई कम करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक ऐसा कारोबारी पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया गया है, जहां व्यवसाय तेजी, पारदर्शिता और पूर्वानुमेय व्यवस्था के साथ संचालित हो सकें।
इस बदलाव के तहत कंपनी पंजीकरण, कराधान, सरकारी खरीद, वित्तीय सेवाओं और डिजिटल भुगतान सहित कारोबार के लगभग हर चरण को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया है। नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम (NSWS) के जरिए विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और राज्य सरकारों की स्वीकृतियों को एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया गया है, जिससे निवेशकों को अलग-अलग विभागों के चक्कर लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वहीं MCA21 पोर्टल ने कंपनी अनुपालन और फाइलिंग प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाकर पारदर्शिता बढ़ाने और प्रक्रियागत देरी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारत की सबसे बड़ी उपलब्धियों में विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म का आपस में जुड़ा हुआ ढांचा भी शामिल है। GSTN, UPI, सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) और उद्यम पोर्टल जैसे प्लेटफॉर्म अलग-अलग काम करने के बजाय एक-दूसरे के पूरक के रूप में कार्य कर रहे हैं। इससे सभी आकार के व्यवसायों के लिए एकीकृत डिजिटल इकोसिस्टम तैयार हुआ है। उद्यम पोर्टल पर लाखों सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) का पंजीकरण हुआ है, जबकि GeM के माध्यम से सरकारी खरीद रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची है और UPI ने डिजिटल भुगतान व्यवस्था को वैश्विक पहचान दिलाई है।
डिजिटल सुधारों का सबसे अधिक लाभ MSME क्षेत्र को मिला है। पहले जहां छोटे उद्यम बाजार और वित्तीय संसाधनों तक सीमित पहुंच के कारण कई चुनौतियों का सामना करते थे, वहीं अब डिजिटल पंजीकरण, आसान अनुपालन और सरकारी खरीद प्लेटफॉर्म तक पहुंच ने नए उद्यमियों के लिए अवसरों का विस्तार किया है। इससे ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में उद्यमिता को बढ़ावा मिला है और समावेशी आर्थिक विकास की दिशा मजबूत हुई है।
डिजिटल गवर्नेंस ने विदेशी निवेशकों के लिए भी भारत को अधिक आकर्षक बनाया है। पारदर्शी नियामक व्यवस्था, ऑनलाइन स्वीकृति प्रणाली और सरल अनुपालन प्रक्रियाओं ने कारोबार की लागत कम करने के साथ निवेशकों का भरोसा भी बढ़ाया है। वैश्विक स्तर पर निवेश और विनिर्माण प्रतिस्पर्धा के दौर में कुशल प्रशासन को अब बुनियादी ढांचे और कर व्यवस्था जितना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल गवर्नेंस को केवल तकनीकी बदलाव के रूप में नहीं देखा जा सकता। साइबर सुरक्षा, डेटा गोपनीयता, डिजिटल प्लेटफॉर्म की निरंतर उपलब्धता और आपसी समन्वय जैसी चुनौतियों पर लगातार काम करना होगा। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित छोटे उद्यमों तक डिजिटल अवसंरचना और डिजिटल साक्षरता समान रूप से पहुंचे।
आगे के सुधारों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित अनुपालन प्रणाली, पूर्वानुमान आधारित नियामक ढांचा, सीमा-पार व्यापार के लिए पेपरलेस दस्तावेज प्रणाली और केंद्र एवं राज्यों के बीच बेहतर डिजिटल समन्वय पर जोर दिया जा सकता है। उद्योग और स्टार्टअप से नियमित परामर्श के जरिए डिजिटल सुधारों को समय की जरूरतों के अनुरूप बनाए रखना भी आवश्यक माना गया है।
भारत का डिजिटल गवर्नेंस मॉडल अब वैश्विक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन रहा है। ग्लोबल साउथ के कई देश कम लागत और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध कराने वाले भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल का अध्ययन कर रहे हैं। यह मॉडल दर्शाता है कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत नवाचार के माध्यम से विकासशील देश भी डिजिटल परिवर्तन का सफल उदाहरण प्रस्तुत कर सकते हैं।
सरकार का मानना है कि ईज ऑफ डूइंग बिजनेस केवल प्रक्रियाओं को सरल बनाने या वैश्विक रैंकिंग सुधारने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना है जहां उद्यमिता को बढ़ावा मिले, निवेशकों का विश्वास मजबूत हो, अनुपालन आसान बने और शासन अधिक नागरिक-केंद्रित हो। विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में डिजिटल गवर्नेंस सुधारों को मजबूत साइबर सुरक्षा, निरंतर नवाचार और संस्थागत जवाबदेही के साथ आगे बढ़ाना देश की दीर्घकालिक आर्थिक प्रगति के लिए महत्वपूर्ण होगा।
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